Tuesday, October 21, 2014

समर्पण की कविता

ग़र जिंदगी एक किताब है
तो तुम कवर हो मेरी जिंदगी का ।
मेरी जिंदगीनुमा किताब को तुम्हीं ने
आकर्षक बनाया
खुद थपेड़े सहती रही
और मुझे बचाती रही हर नुकसान से
मैं फट कर बिखर सकता था कई बार
संवारती रहीसजाती रही
सारे जख्म सहकर
कवर होने का फर्ज तुम निभाती रही 
लेकिन मैं अपने किताब होने के कर्तव्य से दूर हूं ?
बस शब्दों और वाक्यों पर इतरा रहा हूं
लेकिन तुम हो तभी तो मैं हूं ।
कवर हो तुम मेरी जिंदगी का
और जिंदगी एक किताब है । 


No comments: