Monday, October 20, 2014

बधाई हो...

पहले हम याद रखते थे
मां बाबू जी की मैरिज एनवर्सिरी
भाई - बहनों के डेट ऑफ बर्थ
सबसे पसंदीदा टीचर का जन्मदिन

ढोलक की थाप - थाप सुनते
याद हो गए थे कई जन्मदिन
छोटों बच्चों के बर्थडे पर
बाकायदा कार्ड आते
और पड़ोसी तो कई दिन पहले से
याद दिलाते
बुधवार को छुटकू का जन्मदिन है
अगले महीने बड़कू का

खुद भी बच्चे थे
नहीं जानते थे
कुछ रुठ कर केक कटवाते थे
जन्मदिन के दिन मिलते थे
सायकिल और घड़ी ।
स्कूल में चाकलेट खाते
और थैंक्यू बोल देते
लेकिन याद नहीं रखते थे डेट
फिर भी
कुछ तिथियां स्मृति पटल पर
जम गईं
तो कुछ चिपक कर रह गईं

ठीक से याद नहीं
बीस साल पहले
किसी ने
अपनी बेटी का जन्मदिन मनाया हो
या अपनी बहन को विश किया हो
औपचारिकता भी नहीं
अड़ोस, पड़ोस और सामने वाली
ताईयों और चाचियों  ने लला के जन्मदिन पर कथा कराई
लेकिन अपनी लालियों को
आशीर्वाद देने की जहमत शायद ही उठाई

जब हम कुछ बड़े हो गए
तो कॉलेज में , ट्यूशन में
याद रखने लगे थे
कुछ लड़कियों के जन्मदिन
और फिर
तारीख पर
काफी सोच समझ कर बोलते थे
हैप्पी- बर्थडे ।

अब तो रोज
कहते हैं
लिखते हैं
हैप्पी बर्थडे
ना दिमाग की जरुरत है
ना दिल की
रात बारह बजे ही मिल जाती है जानकारी
आज फलाने की है बारी
वॉल पर वॉलपेपर या फिर धीरे से
लिखा
बधाई हो ।

कुछ भी आड़े नहीं आता
ना लिंग भेद
ना मतभेद
दुनिया बदल गई है
बधाई हो ।


( 25 दिसंबर 2012 को लिखी कविता जो हर्षवर्धन जी (बतंगड़ वाले) की फेसबुक वॉल पर साझा की । ) 

No comments: